पुरोला विधानसभा : दावों और वादों के बीच बर्तनों में सिमटा विकास, बुनियादी सुविधाओं के लिए तरसती रवांईं घाटी, सोशल मीडिया पर वायरल एक युवती का वीडियो खोल रहा है विकास के बड़े-बड़े दावों की पोल

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
पुरोला uttarkashi : उत्तराखंड के पर्वतीय क्षेत्रों में विकास के दावों की जमीनी हकीकत क्या है, इसकी एक बानगी पुरोला विधानसभा क्षेत्र से सामने आई है। सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने शासन-प्रशासन और जन प्रतिनिधियों के दावों की पोल खोलकर रख दी है। एक तरफ जहाँ चुनावी मंचों से बड़े-बड़े दावों की गूंज सुनाई देती है, वहीं दूसरी तरफ धरातल पर जनता को बुनियादी सुविधाओं के बजाय केवल बर्तनों के वितरण जैसे लोक-लुभावन कार्यों से बहलाया जा रहा है।
पुरोला विधानसभा के सुदूरवर्ती गाँव शिकारू से आई एक वीडियो रिपोर्ट यहाँ की बदहाली की जीती-जागती तस्वीर बयां करती है। इस वीडियो में एक स्थानीय युवती अपने गाँव की दुर्दशा और सड़क न होने के दर्द को साझा कर रही है। युवती का कहना है कि आज के आधुनिक दौर में भी गाँव तक पहुँचने के लिए केवल पत्थरों से बना एक संकरा और पथरीला रास्ता ही एकमात्र सहारा है। हर चुनाव में नेता आते हैं और ‘अगले मार्च तक सड़क बन जाने’ का आश्वासन देकर चले जाते हैं, लेकिन वह मार्च पिछले कई दशकों में कभी नहीं आया। आलम यह है कि ग्रामीणों को बुनियादी जरूरतों के लिए आज भी कई किलोमीटर का पैदल सफर तय करना पड़ता है।
सड़क न होने का सबसे गंभीर और अमानवीय खामियाजा गाँव के बीमार लोगों और गर्भवती महिलाओं को भुगतना पड़ रहा है। आपातकालीन स्थिति में मरीजों को अस्पताल पहुँचाने के लिए आज भी ग्रामीणों को डंडियों और कंडी का सहारा लेना पड़ता है। कई बार समय पर इलाज न मिलने के कारण मरीज रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं। शिकारू गाँव ही नहीं, बल्कि पुरोला विधानसभा क्षेत्र के सर बडियार, सांखाल, और सेवा जैसे दर्जनों गाँवों के ग्रामीण पिछले तीन दशकों से सड़क के लिए तरस रहे हैं।
विडंबना यह है कि इन क्षेत्रों में खेती और सब्जियां भरपूर मात्रा में होती हैं, लेकिन मुख्य बाजार तक परिवहन की सुविधा न होने के कारण ग्रामीणों का भाड़ा ही उनकी कुल कमाई से ज्यादा लग जाता है। विकास कार्यों की कछुआ गति का सबसे बड़ा उदाहरण मोरी ब्लॉक के गोविन्द वन्य जीव विहार क्षेत्र में देखने को मिलता है, जहाँ वर्ष 2006 में स्वीकृत ‘जखोल धारा’ तीन किलोमीटर मोटरमार्ग का निर्माण 20 वर्ष बीत जाने के बाद भी नहीं हो सका है। इस उपेक्षा से आक्रोशित होकर गत सप्ताह ग्रामीणों ने ग्राम प्रधान की अध्यक्षता में बैठक कर आगामी विधानसभा चुनाव सहित भविष्य के सभी चुनावों का पूर्ण बहिष्कार करने का निर्णय लिया है।
सड़क के साथ-साथ क्षेत्र की स्वास्थ्य सेवाएं भी पूरी तरह वेंटिलेटर पर हैं। रवांईं घाटी का प्रमुख केंद्र बिंदु और यमुनोत्री हाईवे पर स्थित सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (सीएचसी) नौगांव खुद ‘बीमार’ हालत में है। यह अस्पताल न केवल स्थानीय आबादी के लिए महत्वपूर्ण है, बल्कि देश-विदेश से आने वाले लाखों श्रद्धालुओं की आस्था के केंद्र ‘यमुनोत्री धाम’ का मुख्य स्वास्थ्य केंद्र भी है। यमुनोत्री यात्रा के दौरान किसी भी आपातकालीन स्थिति या दुर्घटना में त्वरित उपचार देने की पूरी जिम्मेदारी इसी अस्पताल पर टिकी होती है। इसके बावजूद यहाँ लंबे समय से विशेषज्ञ चिकित्सकों के पद खाली पड़े हैं। मामूली बीमारियों के लिए भी मरीजों को देहरादून या अन्य हायर सेंटरों के लिए रेफर कर दिया जाता है। इस अति-संवेदनशील स्वास्थ्य केंद्र पर डॉक्टरों का न होना स्थानीय जनता के साथ क्रूर मजाक और चारधाम यात्रा पर आने वाले श्रद्धालुओं की सुरक्षा को भगवान भरोसे छोड़ने जैसा है। हाल ही में विशेषज्ञ चिकित्सकों सहित आदि मांग को लेकर स्थानीय ग्रामीणों को उग्र आंदोलन भी करना पड़ा था।
क्षेत्र की शिक्षा व्यवस्था का हाल स्वास्थ्य और सड़क से भी ज्यादा बदतर है। मोरी ब्लॉक के सरकारी स्कूलों में शिक्षकों का भारी टोटा है। कई स्कूल लंबे समय से एकल शिक्षक के भरोसे चल रहे हैं या पूरी तरह शिक्षक विहीन हो चुके हैं। अपने बच्चों का भविष्य अंधकार में डूबता देख मजबूर अभिभावकों ने बच्चों को पढ़ाई के लिए शहरों की ओर भेजना शुरू कर दिया, जिसके कारण सरकारी स्कूलों में छात्र संख्या लगातार घटती गई। शिक्षकों की कमी और छात्रों के अभाव के चलते मोरी ब्लॉक में करीब 30 सरकारी विद्यालय हमेशा के लिए बंद हो चुके हैं, जो इस पहाड़ी क्षेत्र में शिक्षा व्यवस्था के पूरी तरह ध्वस्त होने का सबसे बड़ा और चिंताजनक प्रमाण है।
वायरल वीडियो में स्थानीय युवती ने अपने गाँव और आसपास के लोगों से अपील की है कि वे अब झूठे वादों के झांसे में न आएं, बल्कि एकजुट होकर अपने अधिकारों और सड़क के लिए आवाज उठाएं। इस पूरी स्थिति ने साफ कर दिया है कि उत्तराखंड के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में आज भी ‘पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी’ के साथ-साथ बुनियादी व्यवस्थाएं भी पहाड़ की तरह ही दुर्गम बनी हुई हैं।



