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​प्रसिद्ध साहित्यकार व मुख्य फार्मेसी अधिकारी महाबीर रवांल्टा हुए सेवानिवृत्त, स्वास्थ्य कर्मियों ने आयोजित किया विदाई समारोह 

पत्रिका न्यूज नेटवर्क 

​पुरोलाUTTARKASHI: स्वास्थ्य सेवा के क्षेत्र में अपनी कर्तव्यनिष्ठा की अमिट छाप छोड़ने वाले और क्षेत्र के प्रसिद्ध साहित्यकार महाबीर रवांल्टा अपनी साढ़े 37 वर्ष की लंबी, प्रेरणादायी एवं निष्कलंक शासकीय सेवा के बाद सेवानिवृत्त हो गए हैं। वे उपजिला चिकित्सालय पुरोला में मुख्य फार्मेसी अधिकारी के पद पर तैनात थे। उनके सेवानिवृत्ति अवसर पर चिकित्सालय में डॉक्टरों और स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा एक भव्य विदाई समारोह का आयोजन किया गया, जहाँ सभी ने उनके अद्वितीय योगदान की सराहना करते हुए उन्हें भावुक विदाई दी।

​संघर्षों की भट्टी में तपा ‘कर्मयोगी’ व्यक्तित्व

​10 मई 1966 को सीमांत जनपद उत्तरकाशी के सुदूरवर्ती गांव सरनौल में जन्मे महाबीर रवांल्टा का बचपन पहाड़ की शांत वादियों और बेहद सीमित संसाधनों के बीच बीता। शुरुआती शिक्षा के दौरान ही उन्होंने अपनी असाधारण प्रतिभा का परिचय दिया और जोशियाड़ा के स्कूल में जनपद स्तर पर द्वितीय स्थान प्राप्त किया। राजकीय कीर्ति इंटर कॉलेज उत्तरकाशी से इंटरमीडिएट करने के दौरान पिता की गंभीर बीमारी के कारण उन्हें लंबे समय तक दिल्ली और देहरादून के अस्पतालों के चक्कर काटने पड़े। माता-पिता से दूर और परिचितों के आश्रय में रहने के बावजूद उनके दृढ़ संकल्प ने कभी हार नहीं मानी।

​इंटरमीडिएट के बाद उन्होंने राजकीय पॉलिटेक्निक उत्तरकाशी से फार्मेसी में डिप्लोमा किया और जिला चिकित्सालय से व्यावहारिक प्रशिक्षण लेकर स्वास्थ्य सेवा की राह चुनी। सीखने की ललक ऐसी थी कि उन्होंने सेवा में रहते हुए भी उत्तराखण्ड मुक्त विश्वविद्यालय से हिंदी साहित्य में प्रथम श्रेणी से स्नातकोत्तर (एम.ए.) की उपाधि हासिल की। 1988 में श्रीमती सोबन देई के साथ वैवाहिक जीवन में प्रवेश करने के बाद उन्होंने पारिवारिक जिम्मेदारियों और सेवाधर्म को बखूबी निभाया।

​स्पेशल पुलिस फोर्स से उत्तर प्रदेश स्वास्थ्य सेवा तक का सफर

​रवांल्टा के करियर की शुरुआत 25 जनवरी 1989 को स्पेशल पुलिस फोर्स (मुरादाबाद) से हुई, जहां उन्होंने एक जांबाज सैनिक की तरह भारत-तिब्बत सीमा की बेहद चुनौतीपूर्ण चौकियों पर देश की रक्षा की। इस दौरान उन्होंने ‘सीमा प्रहरी’ स्मारिका का संपादन भी किया, जो उनकी साहित्यिक और संगठनात्मक क्षमता का पहला बड़ा प्रमाण था।

​25 सितंबर 1991 को उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में तैनाती के बाद उन्होंने जनसेवा को अपना परम लक्ष्य बना लिया। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र धरपा और वैरा फिरोजपुर में कार्य करते हुए वे केवल दवा बांटने वाले कर्मचारी नहीं, बल्कि मरीजों के लिए आत्मीयता और विश्वास का दूसरा नाम बन गए। पल्स पोलियो जैसे राष्ट्रीय अभियानों में उनके बेमिसाल काम को देखते हुए, तत्कालीन मुख्यमंत्री सुश्री मायावती द्वारा गठित टास्क फोर्स के माध्यम से जनता की भारी मांग पर उन्हें दोबारा धरपा केंद्र में वापस लाया गया था, जो उनके प्रति जनविश्वास की एक ऐतिहासिक मिसाल है।

​आराकोट की सुदूर पहाड़ियों में 8 साल तक अकेले संभाली कमान

​2010 में उत्तराखण्ड वापसी के बाद उन्होंने जनपद के अंतिम छोर पर स्थित अति. प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र आराकोट में अपनी सेवाओं का एक स्वर्णिम अध्याय लिखा। डॉक्टरों की भारी कमी के बीच उन्होंने अकेले 8 वर्षों तक इस सुदूर केंद्र का सफल संचालन किया। इस दौरान उन्होंने परिवार नियोजन, नेत्र शिविर, कोविड-19 टीकाकरण और मिजल्स-रुबेला जैसे राष्ट्रीय कार्यक्रमों को बेहद विषम परिस्थितियों में भी शत-प्रतिशत सफल बनाया। जखोल, फिताड़ी, ओसला, लिवाड़ी, सिरगा, डामटी, थुनारा और मौंडा जैसे अत्यंत दुर्गम और बर्फबारी वाले क्षेत्रों में जीवन की परवाह किए बिना वे मीलों पैदल चलकर स्वास्थ्य सेवाएं पहुंचाने जाते रहे। वर्ष 2013 की केदारनाथ आपदा और 2019 की आराकोट त्रासदी के समय उन्होंने एक सजग प्रहरी और संवेदनशील इंसान की तरह फ्रंटलाइन पर रहकर पीड़ितों की सेवा की।

​पुरोला में संक्षिप्त पर ऐतिहासिक कार्यकाल

​17 फरवरी 2025 को उपजिला चिकित्सालय पुरोला में मुख्य फार्मेसी अधिकारी का पदभार ग्रहण करने के बाद, मात्र 1 वर्ष 3 माह 4 दिन के अपने संक्षिप्त सेवाकाल में भी उन्होंने अपने अनुशासन, सहृदयता और कार्यकुशलता की ऐसी अमिट छाप छोड़ी कि वे पूरे स्टाफ के लिए प्रेरणास्रोत बन गए।

​स्वास्थ्य सेवाओं के साथ-साथ साहित्य, लोकसंस्कृति और रंगमंच के प्रति उनका गहरा अनुराग उनके बहुआयामी व्यक्तित्व को और भी विशिष्ट बनाता है। लोकसंस्कृति और साहित्य के माध्यम से उन्होंने समाज की सांस्कृतिक चेतना को समृद्ध करने का जो कार्य किया, उसे हमेशा याद रखा जाएगा।

​विदाई समारोह में वक्ताओं ने कहा कि महाबीर रवांल्टा की यह सेवानिवृत्ति उनके जीवन का अवसान नहीं, बल्कि उनके समृद्ध अनुभवों और संघर्षों से सजे एक नए सामाजिक व साहित्यिक अध्याय की शुरुआत है। चिकित्सालय प्रशासन और स्थानीय जनता ने उनके उत्तम स्वास्थ्य, दीर्घायु और सुख-शांति से परिपूर्ण आगामी जीवन की कामना की।

विदाई समारोह के बाद महाबीर रवांल्टा अपने गांव महर गांव पहुंचे, तो दृश्य बेहद भावुक और गौरवपूर्ण हो गया। उनके स्वागत में पूरा गांव उमड़ पड़ा और ग्रामीणों ने रवांल्टा का पारंपरिक ढोल-नगाड़ों के साथ फूल मालाओं से भव्य स्वागत किया।

इस विदाई और सेवानिवृत्ति के पावन अवसर पर महाबीर रवांल्टा के निवास स्थान पर आज एक विशेष मिलन समारोह का आयोजन किया गया है। अपनी इस खुशी और जीवन के नए अध्याय की शुरुआत को साझा करने के लिए उनके परिवार द्वारा आज रात्रि को समस्त ग्रामीणों के लिए ‘रात्रि भोज’ (प्रीतिभोज) की व्यवस्था भी की गई है।

 

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