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विकास के दावों के बीच ‘डंडी-कंडी’ के भरोसे जिंदगी: हिमाचल सीमा पर बसे सेवा गांव की दर्दनाक हकीकत

पत्रिका न्यूज नेटवर्क 

​मोरीUTTARKASHI: पुरोला विधान सभा में जहां एक ओर विकास के बड़े बड़े दावे किए जा रहे हैं वहीं मोरी ब्लॉक आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए तरस रहा है। हिमाचल प्रदेश की सीमा से सटा मोरी ब्लॉक का ‘सेवा गांव’ आज के आधुनिक दौर में भी सड़क मार्ग से पूरी तरह महरूम है। सरकार की ओर से यहां विकास के बड़े-बड़े दावे तो किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि बुनियादी शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाएं यहां दम तोड़ चुकी हैं। क्षेत्र के 30 विद्यालय छात्र संख्या शून्य होने के कारण बंद हो चुके हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं का आलम यह है कि यहां इंसानी जिंदगी भगवान भरोसे है। हाल ही में सेवा गांव की 56 वर्षीय खंतरा देवी की अचानक तबीयत बिगड़ गई। गांव तक कोई सड़क न होने के कारण ग्रामीणों को मजबूरन उन्हें ‘डंडी-कंडी’ के सहारे 12 किलोमीटर का उबड़-खाबड़ और पथरीला रास्ता पैदल तय करना पड़ा। किसी तरह मुख्य सड़क तक पहुंचाने के बाद उन्हें मोरी अस्पताल ले जाया गया, जहां प्राथमिक उपचार के बाद उनकी गंभीर स्थिति को देखते हुए डॉक्टरों ने उन्हें हायर सेंटर रेफर कर दिया।

​यह कोई पहली घटना नहीं है। सड़क विहीन होने का खामियाजा इस क्षेत्र की कई गर्भवती महिलाएं पूर्व में भी भुगत चुकी हैं, जिन्होंने अस्पताल पहुंचने से पहले ही रास्ते में तड़प-तड़प कर दम तोड़ दिया। प्रसव जैसी सामान्य और आवश्यक स्थिति भी यहां की महिलाओं के लिए जीवन-मरण का प्रश्न बन जाती है।

​इस बदहाली की मुख्य वजह सिस्टम की कछुआ चाल और घोर लापरवाही है। धौला से सेवा गांव के लिए सड़क निर्माण का कार्य करीब एक दशक पहले शुरू हुआ था, जो आज तक पूरा नहीं हो पाया है। दस साल का लंबा वक्त बीत जाने के बाद भी सड़क का अधूरा होना प्रशासनिक उदासीनता और विभाग की मनमानी को साफ बयां करता है।

​यक्ष प्रश्न यह है कि क्या गांव में रहने वाले इन नागरिकों के जीवन की कोई कीमत नहीं है? आखिर कब तक सेवा आदि गांव के लोग अपनी जान जोखिम में डालकर ‘डंडी-कंडी’ के सहारे जिंदगी और मौत की जंग लड़ते रहेंगे? सरकार और उनके नुमाइंदों को कागजी विकास के दावों से बाहर निकलकर इस सड़क मार्ग को युद्ध स्तर पर पूरा करना चाहिए, ताकि भविष्य में किसी दूसरी खंतरा देवी को तड़पना न पड़े और न ही किसी गर्भवती महिला को रास्ते में अपनी जान गंवानी पड़े।

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