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यमुनोत्री धाम यात्रा में ‘सिस्टम’ फेल! कुली एजेंसी ठेकेदार की रोटेशन व्यवस्था की खुली पोल, सीधे सादे मजदूरों से ‘सौतेला व्यवहार’

पत्रिका न्यूज नेटवर्क 

यमुनोत्री uttarkashi: विश्व प्रसिद्ध चारधाम यात्रा के प्रमुख पड़ाव यमुनोत्री धाम में व्यवस्थाएं एक बार फिर सवालों के घेरे में हैं। धाम के पैदल मार्ग पर देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालुओं को डंडी-कंडी, घोड़े और खच्चरों के जरिए दर्शन कराने वाले गरीब और सीधे-सादे मजदूर भाइयों के साथ कुली एजेंसी ठेकेदार द्वारा मनमाने और सौतेले व्यवहार करने का मामला सामने आया है।

नियमों के मुताबिक, यमुनोत्री पैदल मार्ग पर यातायात और भीड़ को नियंत्रित करने के लिए जिला पंचायत द्वारा अधिकृत कुली एजेंसी ठेकेदार एक ‘नंबर सिस्टम’ (रोटेशन व्यवस्था) चलाता है। जिसका नंबर आता है, उसे पर्ची दी जाती है और वही यात्री को ले जा सकता है।

लेकिन धरातल पर सच्चाई इसके बिल्कुल उलट है। स्थानीय लोगों और पीड़ित मजदूरों का आरोप है कि मार्ग पर अधिकांश घोड़े-खच्चर बिना किसी वैध पर्ची के धड़ल्ले से यात्रियों को ढो रहे हैं। बताया जा रहा है कि ये तमाम घोड़े खुद ठेकेदार के करीबियों के हैं, जिनके लिए कोई नियम-कानून मायने नहीं रखता।

मजदूर युवाओं का आरोप है, कि “इनकी खुद की भी खच्चरें हैं जो रोज परमानेंट जाती हैं, इनके लिए कोई नंबर नहीं है। नियम सबके लिए समान होने चाहिए। यहां किसी को जाने दिया जा रहा है, किसी को नहीं।”जब कोई गरीब मजदूर बिना पर्ची के मजबूरी में यात्री ले जाने की कोशिश करता है, तो उसे तुरंत रोक दिया जाता है, जबकि रसूखदारों की खच्चरें बिना रोक-टोक के हर दिन कमाई कर रही हैं।

युवाओं ने कहा कि “नियम चलाने हैं तो सही से चलाओ, नहीं तो सभी को जाने दो! सबकी रोजी-रोटी है, सब इसी के सहारे जी रहे हैं। लेकिन ये लोग गरीब लोगों का शोषण कर रहे हैं।”

यमुनोत्री क्षेत्र के सामाजिक कार्यकर्ता महाबीर पंवार ‘माही’ ने इस व्यवस्था पर रोष व्यक्त करते हुए कहा कि शासन-प्रशासन इस पूरी धांधली को लेकर आंखें मूंदे बैठा है। यमुनोत्री धाम की रोटेशन व्यवस्था के सारे नियम-कानून ताक पर रख दिए गए हैं। उन्होंने जिलाधिकारी से इस मामले में तत्काल हस्तक्षेप करने और इस भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने की मांग की है।

चारधाम यात्रा उत्तराखंड की आर्थिकी और साख की रीढ़ है। ऐसे में चंद रसूखदार ठेकेदारों के फायदे के लिए स्थानीय युवाओं के हकों पर डाका डालना और उनके साथ सौतेला व्यवहार करना बेहद चिंताजनक है। जब सुरक्षा के लिए मौके पर एसडीआरएफ और पुलिस के जवान तैनात हैं, तब उनकी नाक के नीचे नियमों का यह खिलवाड़ किसके संरक्षण में चल रहा है?

“चारधाम यात्रा शुरू होने से पहले शासन-प्रशासन और जिला पंचायत द्वारा सुगम, सुरक्षित और पारदर्शी यात्रा व्यवस्था के बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं। करोड़ों रुपये के बजट और हाई-टेक मॉनिटरिंग की बातें सुर्खियां बनती हैं। लेकिन यमुनोत्री धाम के पैदल मार्ग से आई यह जमीनी हकीकत इन खोखले दावों की पोल खोलने के लिए काफी है। सवाल यह उठता है कि जब नियम-कानून सिर्फ कागजों तक सीमित हैं, तो यात्रा व्यवस्था का दम भरने वाला यह भारी-भरकम ‘सिस्टम’ आखिर धरातल पर क्या कर रहा है? क्या जिला प्रशासन और संबंधित अधिकारियों की जिम्मेदारी सिर्फ ठेके अलॉट करने तक सीमित है? अगर रसूखदारों और ठेकेदारों की मनमानी के आगे गरीब मजदूरों की आजीविका को यूं ही कुचला जाता रहेगा, तो सिस्टम पर जनता का भरोसा कैसे कायम रहेगा? प्रशासन को इसमें जागना होगा और केवल कड़े नियम बनाने नहीं, बल्कि उन्हें बिना किसी पक्षपात के लागू करने की इच्छाशक्ति दिखानी होगी।”

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