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अंकिता भंडारी हत्याकांड: देहरादून में भारी बारिश के बीच फूटा आक्रोश, प्रदर्शनकारियों ने सीबीआई दफ्तर के मुख्य गेट पर जड़ा ताला

पत्रिका न्यूज नेटवर्क 

Dehradun: अंकिता भंडारी हत्याकांड की सीबीआई जांच में 6 महीने बीत जाने के बाद भी कोई ठोस प्रगति और मामले में ‘वीआईपी के नाम का खुलासा न किए जाने से नाराज उत्तराखंड की जनता का सब्र आखिरकार टूट गया। ‘अंकिता न्याय यात्रा संयुक्त संघर्ष मंच’ के बैनर तले आज सैकड़ों आंदोलनकारियों और मातृशक्ति ने देहरादून स्थित केंद्रीय जांच ब्यूरो के क्षेत्रीय कार्यालय का रुख किया। भारी बारिश और खराब मौसम के बावजूद, प्रदर्शनकारियों ने सीबीआई कार्यालय के मुख्य गेट पर ताला जड़कर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया।

उत्तराखंड की मातृशक्ति और विभिन्न सामाजिक संगठनों के कार्यकर्ताओं ने भारी बारिश के बावजूद भी हाथों में छाते और तख्तियां लेकर सीबीआई जवाब दो”, “अंकिता को न्याय दो” और “वीआईपी को गिरफ्तार करो” नारे लगाते हुए सीबीआई कार्यालय के मुख्य गेट पर ताला जड़कर अपना कड़ा विरोध दर्ज कराया। आंदोलनकारियों का कहना है कि सीबीआई जांच की एफआईआर दर्ज हुए 6 महीने से अधिक का समय बीत चुका है, लेकिन आज तक इस जांच का कोई सिरा सामने नहीं आया है।
​प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे नेताओं और वक्ताओं ने राज्य सरकार और जांच एजेंसी की मंशा पर गंभीर सवाल उठाए। आंदोलनकारियों का कहना है कि अगर यही एफआईआर किसी विपक्षी नेता या आम नागरिक के खिलाफ होती, तो पुलिस और सीबीआई 6 महीने तो दूर, 6 घंटे के भीतर उसे दबोच लेती। लेकिन इस मामले में 6 महीने बीत जाने के बाद भी सरकार और जांचकर्ता मौन साधे हुए हैं। यह चुप्पी साबित करती है कि पर्दे के पीछे छुपा हुआ ‘वीआईपी’ कोई बेहद रसूखदार व्यक्ति है, जिसे सत्ता का खुला संरक्षण मिल रहा है।”

इस आंदोलन की कमान मुख्य रूप से उत्तराखंड की महिलाओं (मातृशक्ति) ने संभाली हुई है। इस दौरान स्थानीय संगठनों की महिलाओं ने मीडिया से बात करते हुए कहा कि जब तक अंकिता के हत्यारों और इस वीआईपी को सलाखों के पीछे नहीं भेजा जाता, तब तक यह न्याय यात्रा रुकने वाली नहीं है।
​आंदोलनकारियों ने चेतावनी दी है कि सीबीआई कार्यालय के मुख्य गेट पर ताला जड़ना तो बस एक शुरुआत है। यदि इसके बाद भी केंद्रीय जांच एजेंसी ने अपनी सुस्ती नहीं छोड़ी और जांच की प्रगति रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की, तो आने वाले दिनों में पूरे उत्तराखंड की जनता सड़कों पर उतरकर इस आंदोलन को और अधिक उग्र रूप देने के लिए मजबूर होगी।

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