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डिजिटल क्रांति की आंधी में उड़े अखबार : मुख्यधारा के मीडिया का बदला भूगोल, ‘नगण्य’ हुई प्रिंट की ताकत’

पत्रिका न्यूज नेटवर्क 

​विशेष रिपोर्ट

पुरोलाUTTARKASHI: कभी सुबह की चाय के साथ देश-दुनिया की खबर देने वाला ‘अखबार’ आज खुद इतिहास के पन्नों में सिमटने को मजबूर हो गया है। सूचना क्रांति और सोशल मीडिया की ऐसी आंधी चली है कि मुख्यधारा के बड़े-बड़े न्यूज चैनल और दशकों पुराने अखबारों का साम्राज्य डगमगा गया है। जो मीडिया कल तक सत्ता और समाज की दिशा तय करता था, आज वह खुद अस्तित्व बचाने के लिए ‘डिजिटल नेटवर्किंग’ की शरण में जाने को मजबूर है।

​पुरोला क्षेत्र की बात करें, तो यहां की जमीनी हकीकत प्रिंट मीडिया के ढहते किले की गवाही खुद दे रही है।एक दौर था जब पुरोला क्षेत्र में अखबारों का व्यापक प्रसार था। सुबह होते ही सैकड़ों की तादाद में अलग-अलग बैनरों के अखबार यहां पहुंचते थे। लोग खबरों के लिए हॉकर्स का इंतजार करते थे लेकिन आज यह संख्या घटकर महज दर्जनों का आंकड़ा भी पार नही कर रही है। सैकड़ों अखबारों की जगह अब इक्का-दुक्का प्रतियां ही नजर आती हैं। प्रिंट मीडिया की यह साख अब लगभग नगण्य हो चुकी है।

आज एक आम आदमी जिसके पास स्मार्टफोन और इंटरनेट है, वह खुद में एक ‘न्यूज चैनल’ बन चुका है। सोशल नेटवर्किंग ने खबरों की परिभाषा बदल दी है।

अखबार कल सुबह खबर देगा, टीवी चैनल आधे घंटे बाद दिखाएगा, लेकिन सोशल मीडिया पर घटना के घटते ही लाइव अपडेट्स और वीडियो सामने आ जाते हैं। इस स्पीड के सामने मुख्यधारा का मीडिया पूरी तरह बौना साबित हुआ है।

अब जनता को अपनी समस्याओं के लिए किसी बड़े पत्रकार या संपादक की मर्जी का मोहताज नहीं रहना पड़ता। एक ट्वीट या पोस्ट सीधे सरकार और प्रशासन तक पहुंच जाती है।

​यह सोशल मीडिया की ही ताकत है कि आज देश के सबसे बड़े मीडिया घरानों को भी अपने प्रिंट और टीवी एडिसन से ज्यादा ध्यान अपने डिजिटल प्लेटफॉर्म, मोबाइल ऐप्स और सोशल मीडिया हैंडल्स पर देना पड़ रहा है। जो चैनल कल तक सोशल मीडिया को ‘अपुष्ट खबरों का बाजार’ कहते थे, आज वे खुद उसी बाजार में लाइक, शेयर और सब्सक्राइब की रेस में दौड़ रहे हैं।

​अखबारों की घटती संख्या इस बात का साफ संकेत है कि पाठक अब कागज के पन्नों से निकलकर स्क्रीन पर शिफ्ट हो चुका है।

​आज के दौर में सबसे दिलचस्प और हैरान करने वाली तस्वीर यह देखने को मिल रही है कि खुद पत्रकार भी अब अखबार के पन्नों से ज्यादा सोशल मीडिया की ताकत पर भरोसा करने लगे हैं। ग्रामीण और कस्बाई इलाकों में काम कर रहे ग्राउंड रिपोर्टर्स के सामने अब अपने वजूद और पहचान को बचाए रखने का बड़ा संकट खड़ा हो गया है।

अखबारों के घटते सर्कुलेशन के कारण खबरें आम जनता तक सीधे नहीं पहुंच पा रही हैं। ऐसे में पत्रकार सुबह उठते ही सबसे पहले अखबार में छपी अपनी खबर की फोटो खींचते हैं, और उसकी डिजिटल कतरन (क्रॉप इमेज) बनाते हैं और उसे फेसबुक, व्हाट्सएप स्टेटस पर पोस्ट करते हैं। विडंबना देखिए, जो खबर अखबार के पन्ने पर रहकर दम तोड़ देती, उसे जिंदा रखने के लिए पत्रकारों को सोशल मीडिया के ‘लाइक’, ‘कमेंट’ और ‘शेयर’ का सहारा लेना पड़ रहा है।

जनता के बीच अपनी धाक जमाने और नेताओं-अधिकारियों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए अब अखबार के बंडल नहीं, बल्कि व्हाट्सएप ग्रुप्स की पीडीएफ और इमेज ज्यादा कारगर साबित हो रही हैं। “कल तक जो पत्रकार जनता की आवाज को अखबार के जरिए पहचान देते थे, आज वे खुद अपनी पहचान के लिए सोशल मीडिया के एल्गोरिदम के मोहताज हो गए हैं। यह इस बात का साफ प्रमाण है कि अखबारों का वितरण भले ही हर दिन कम हो रहा हो, लेकिन पत्रकारों की मजबूरी ने सोशल मीडिया को ‘असली न्यूज़ रूम’ बना दिया है।”जब खबर लिखने वाला और खबर छापने वाला दोनों ही यह मान चुके हैं कि उनका पाठक जमीन पर नहीं बल्कि ‘ऑनलाइन’ बैठा है, तो कागज पर लाखों रुपये खर्च करके छपने वाले इन अखबारों का भविष्य क्या होगा? लगातार घटती अखबारों की संख्या और पत्रकारों का यह डिजिटल शिफ्ट साफ गवाही दे रहा है कि आने वाले समय में केवल वही पत्रकार या मीडिया हाउस टिक पाएगा, जिसकी डिजिटल मौजूदगी मजबूत होगी।

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