6 वर्ष बाद गूंजे महासू देवता के जयकारे: खन्यासणी में ऐतिहासिक जागरण संपन्न, हैरतअंगेज ‘लड़ा’ और समृद्ध लोकनृत्य बने आकर्षण का केंद्र

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
फ़तेह पर्वत, मोरी uttarkashi: रवांई घाटी की पौराणिक और समृद्ध देव-संस्कृति की अनूठी झलक फ़तेह पर्वत क्षेत्र के सीमांत ग्राम खन्यासणी में देखने को मिली। छह वर्षों के लंबे अंतराल के बाद आयोजित शिरकुडिया महासू (शेडकुड़िया महाराज) देवता के तीन दिवसीय भव्य जागरण महोत्सव ने संपूर्ण घाटी को भक्ति, आस्था और पारंपरिक उल्लास से सराबोर कर दिया। जौनसार-बावर सहित उत्तराखंड के विभिन्न कोनों से पहुंचे हजारों श्रद्धालुओं ने इस आलौकिक पर्व का साक्षी बनकर महासू देवता का आशीर्वाद लिया।
पवित्र स्नान से लेकर ‘चीड़ा’ प्रज्वलन तक की पारंपरिक रस्में
त्रिदिवसीय आयोजन के मुख्य दिवस पर तड़के शिरकुड़िया महासू के देव-चिह्नों और मूर्तियों का वैदिक एवं पौराणिक विधि-विधान से स्नान कराकर विशेष पूजा-अर्चना की गई। शाम ढलते ही क्षेत्र की प्राचीन ‘चीड़ा’ परंपरा संपन्न हुई। लकड़ी के विशाल स्तंभ पर रखे पाषाण खंड के ऊपर अग्नि प्रज्वलित की गई, जो पूरी रात देव-प्रकाश के रूप में धधकती रही। चीड़ा कार्यक्रम के बाद उमड़े जनसैलाब ने महासू देवता के दर्शन कर सुख-समृद्धि की मनौती मांगी।
रोमांचक ‘लड़ा’ परंपरा: बकरी के बालों से बनी रस्सी पर देव-नृत्य
मध्यरात्रि करीब 12 से 1 बजे और पुनः सुबह 6:30 बजे रवांई संस्कृति की सबसे हैरतअंगेज ‘लड़ा’ परंपरा का प्रदर्शन हुआ। तीन-चार मंजिला पारंपरिक काष्ठ शैली की कोठी से जमीन तक बांधी गई मजबूत डोर (जो बकरियों के ऊन व बालों से तैयार की जाती है) के सहारे शिरकुड़िया महासू के पश्वा संतुलन साधते और नृत्य करते हुए नीचे उतरे। इस दृश्य को देखकर श्रद्धालु विस्मय और श्रद्धा से नतमस्तक हो उठे। जमीन पर उतरते ही भक्तों ने देवता को कंधों पर उठाया और स्थानीय वाद्ययंत्रों की थाप पर देवता ने मैदान में थिरकते हुए सभी को शुभाशीष दिया। दोपहर में पारंपरिक अस्त्र-शस्त्रों (तलवार, खांडा, दात्रा) के साथ देव-चिह्न का भव्य प्रदर्शन हुआ।
रातभर चला तांदी-रासो, पारंपरिक वेशभूषा में झलकी लोक-संस्कृति
इस दिव्य उत्सव में रवांई की लोककला अपने जीवंत रूप में नजर आई। पारंपरिक वाद्ययंत्रों की गूंज के बीच रातभर तांदी, रासो और चौपाती नृत्यों का दौर चलता रहा। विशेष रूप से बाजगी समुदाय की महिलाओं द्वारा पारंपरिक घाघरा पोशाक में प्रस्तुत किया गया सामूहिक नृत्य केंद्र में रहा, जहां पुरुषों के पारंपरिक गीतों की तान पर महिलाओं ने वृत्ताकार घेरे में मनमोहक ताल मिलाई।
अतिथि सत्कार की मिसाल और जनप्रतिनिधियों की मौजूदगी
आयोजन में बंगाण, पंचगाईं, बडासू, अडोर, सिंगतूर, रामा सिंराईं और कमल सिंराईं पट्टियों सहित दूर-दराज से आए अतिथियों के ठहरने व खान-पान की व्यवस्था ग्राम खन्यासणी के ग्रामीणों ने निःस्वार्थ भाव से की, जिसने क्षेत्र की अटूट अतिथि-सत्कार परंपरा को पुनः सिद्ध किया। इस पावन अवसर पर क्षेत्रीय विधायक दुर्गेश लाल, प्रमुख रणदीप सिंह सहित जिला व क्षेत्र पंचायत सदस्य, ग्राम प्रधान और क्षेत्र के प्रबुद्ध स्याणे-बुजुर्ग उपस्थित रहे। 6 वर्ष बाद हुए इस भव्य अनुष्ठान ने एक बार फिर रवांई घाटी की समृद्ध लोक-धरोहर को जीवंत कर दिया।



