मोरी ब्लॉक में ‘शून्य’ होते स्कूल और ‘बर्तन’ बांटता विकास

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
मोरीUTTARKASHI: मोरी ब्लॉक इन दिनों अपनी प्राकृतिक सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि दम तोड़ती शिक्षा व्यवस्था के कारण चर्चा में है। जहां एक ओर “पढ़ेगा इंडिया तो बढ़ेगा इंडिया के” सरकार नारे लगाती है, वहीं मोरी ब्लॉक के 30 विद्यालयों का इस सत्र में बंद होना और हरकीदून घाटी के अंतिम गांव ओसला के एक मात्र छात्र नामांकन वाले जूनियर हाई स्कूल भवन का निर्माण कार्य गत 15 वर्षों से अधूरा होना डबल इंजन के विजन पर एक करारा तमाचा है। यहां विकास के दावों की पोल खुल रही है और शिक्षा व्यवस्था पूरी तरह वेंटिलेटर पर नज़र आ रही है।
हरकीदून घाटी का ओसला गांव अपनी प्राकृतिक एवं सांस्कृतिक विरासत के लिए जाना जाता है, लेकिन यहां का जूनियर हाई स्कूल पिछले 15 वर्षों से सरकारी उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। जिस भवन को छात्रों की किलकारियों से गूंजना चाहिए था, वह अधूरा निर्माण पिछले डेढ़ दशक से ग्रामीणों के पशुओं का चारा(घास-फूस) रखने का अड्डा बना हुआ है। इस विद्यालय में वर्तमान में मात्र एक छात्र पंजीकृत है। यह आंकड़ा न केवल प्रशासनिक विफलता है, बल्कि यह भी बताता है कि गांव वालों का अब सरकारी तंत्र से भरोसा उठ चुका है।
मोरी ब्लॉक में बंद हुए 30 विद्यालयों का सबसे बड़ा कारण छात्र संख्या का शून्य होना बताया जा रहा है। लेकिन सवाल यह है कि छात्र संख्या शून्य क्यों हुई? ब्लॉक के अधिकांश स्कूलों में पद रिक्त पड़े हैं। जब पढ़ाने वाला ही नहीं होगा, तो अभिभावक बच्चों को वहां क्यों भेजेंगे? मोरी ब्लॉक में गांव तो आबाद हैं, घरों में चूल्हे जल रहे हैं, लेकिन स्कूल वीरान हैं। लोग अपने बच्चों के भविष्य की खातिर उन्हें शहरों की ओर भेजने को मजबूर हैं। यह एक ‘शैक्षणिक पलायन’ है जोकि मोरी ब्लॉक में गत कई वर्षों से जारी है।
दुर्गम क्षेत्रों में शिक्षा का अधिकार केवल कागजों तक सीमित रह गया है। ओसला गांव में भवन निर्माण का कार्य 15 वर्षों से पूरा न होना शिक्षा विभाग की घोर लापरवाही को उजागर कर रहा है।
पुरोला विधान सभा में निर्माण कार्य (ठेके) खूब हो रहे हैं, क्योंकि उनमें भारी ‘कमीशन’ का खेल होता है। लेकिन स्कूलों के रखरखाव और शिक्षकों की नियुक्ति में किसी की रुचि नहीं है, क्योंकि शिक्षा के मंदिर को संवारने में शायद वह ‘मलाई’ नहीं है जो अन्य बड़े प्रोजेक्ट्स में है।



