”खाकी की जांच, अपनों को क्लीन चिट: केशव थलवाल मामले में ‘मित्र पुलिस’ पर उठते गंभीर सवाल!”

पत्रिका न्यूज नेटवर्क
देहरादून: टिहरी जिले के प्रतापनगर ब्लॉक के एक गरीब परिवार के युवक केशव थलवाल और पुलिस प्रशासन के बीच छिड़ी जंग ने अब एक नया मोड़ ले लिया है। चार महीने जेल में बिताने और पुलिस पर बेहद अमानवीय यातनाओं के आरोप लगाने वाले केशव के दावों को पुलिस जांच में ‘बेबुनियाद’ करार दे दिया गया है। 7 अप्रैल को आई जांच रिपोर्ट ने थानाध्यक्ष धर्मेन्द्र रौतेला को क्लीन चिट दे दी है, लेकिन इस फैसले ने जनमानस में चर्चाओं और संदेह का बाजार गर्म कर दिया है।
केशव थलवाल जो पेशे से जेसीबी ऑपरेटर थे, (अब एक क्राइम रिपोर्टर ) सोशल मीडिया पर पुलिस की कथित अनियमितताओं के खिलाफ मुखर रहते थे। केशव का आरोप है कि इसी रंजिश के कारण पुलिस ने उन्हें चंबा से गिरफ्तार किया।
जेल से बाहर आने के बाद केशव ने जो खुलासा किया, उसने पूरे प्रदेश को झकझोर दिया था। केशव ने पुलिस पर संगीन आरोप लगाते हुए कहा था कि कोटी कॉलोनी पुलिस चौकी में थानाध्यक्ष धर्मेन्द्र रौतेला ने उनके ऊपर पेशाब की तथा पीने के पानी में थूक कर जबरन उन्हे पानी पिलाया गया इतना ही नही रात भर पुलिस ने बर्बरता से उनकी पिटाई की और मानसिक टॉर्चर किया।
मामले की गंभीरता को देखते हुए आईजी गढ़वाल ने जांच सीओ श्रीनगर (पौड़ी) अनुज कुमार को सौंपकर तीन माह का समय दिया था। इस बीच केशव थलवाल ने उत्तराखंड के विभिन्न देवी देवताओं के मंदिर में न्याय हेतु प्रार्थना भी की थी।
हालांकि, तय समय सीमा (तीन माह) बीत जाने के बाद भी जांच रिपोर्ट सार्वजनिक नहीं की गई, तो न्याय न मिलने से आक्रोशित केशव ने डीजीपी कार्यालय पहुंच कर न्याय की फरियाद की तो उसे वहां से उठाकर जेल डाल दिया गया। जेल से रिहाई होने के कुछ दिन बाद केशव ने सोशल मीडिया पर आईजी के खिलाफ बेहद तीखी टिप्पणी कर दी, जिसमें उन्होंने जांच सार्वजनिक करने की चुनौती दी। इस पोस्ट के वायरल होने के तुरंत बाद पुलिस हरकत में आई और जांच का नतीजा सामने रख दिया।
पुलिस की जांच: ‘आरोप बेबुनियाद’
7 अप्रैल को सार्वजनिक की गई रिपोर्ट में पुलिस ने स्पष्ट किया है कि:
• थानाध्यक्ष धर्मेन्द्र रौतेला और अन्य कर्मियों पर लगाए गए सभी आरोप झूठे पाए गए हैं।
• सभी पुलिस कर्मियों को क्लीन चिट दी जाती है।
जनता के बीच सुलगते सवाल
पुलिस द्वारा खुद की जांच कर खुद को ही क्लीन चिट दिए जाने पर अब सवाल उठने लगे हैं। सोशल मीडिया और स्थानीय गलियारों में लोग पूछ रहे हैं:
• क्या एक प्रभावशाली पुलिस अधिकारी के खिलाफ पुलिस की आंतरिक जांच कभी निष्पक्ष हो सकती है?
• क्या तीन महीने की जांच में छह महीने का वक्त सिर्फ इसलिए लगा कि मामला ठंडा पड़ जाए?
• यदि केशव के आरोप झूठे थे, तो जांच रिपोर्ट पेश करने में इतनी देरी क्यों हुई?
उत्तराखंड में कानून-व्यवस्था और ‘मित्र पुलिस’ की कार्यशैली को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं। बढ़ते अपराध और पुलिस कस्टडी में हुई मौतों के मामलों ने राज्य की जनता के बीच असुरक्षा और अविश्वास का माहौल पैदा कर दिया है। वर्ष 2009 में भी रणवीर एनकाउंटर में पुलिसकर्मियों को दोषी करार दिए जाने के बाद उत्तराखंड मित्र पुलिस के दामन पर कभी न धुलने वाला दाग लग गया था।
केशव मामला — सियासी चुप्पी या सोची-समझी बेरुखी?
उत्तराखंड के ज्वलंत मुद्दों पर अक्सर मुखर रहने वाले राजनेताओं की ‘केशव मामले’ में चुप्पी अब सवालों के घेरे में है। जहां एक ओर उत्तराखंड क्रांति दल (UKD) के नेता आशुतोष नेगी इस लड़ाई को अकेले दम पर लड़ते नजर आ रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सत्ता पक्ष और विपक्ष के दिग्गज नेताओं की खामोशी ने क्षेत्र की जनता को हैरत में डाल दिया है।
“लालघाटी की खामोशी: क्या ठेकेदारी की भेंट चढ़ गई प्रतापनगर की क्रांतिकारी चेतना?”
सबसे अधिक हैरानी तो प्रतापनगर के स्थानीय नेताओं, जनप्रतिनिधियों के खिलाफ देखी जा रही है। केशव के अपने क्षेत्र के इन नेताओं ने जिस तरह से इस मामले से दूरी बनाई है, उससे लोगों के मन में कई कड़वे सवाल जन्म ले रहे हैं। सोशल मीडिया से लेकर गांव की गलियों तक एक ही चर्चा है: “क्या केशव कोई बड़ा आतंकी है?” यदि कोई व्यक्ति गंभीर अपराध में भी संलिप्त हो, तब भी भारतीय संविधान और मानवाधिकार उसे मानवीय गरिमा के साथ व्यवहार का अधिकार देते हैं।
प्रतापनगर क्रांतिकारियों की भूमि रही हैं, कभी इसे लालघाटी के नाम से भी जाना जाता था लेकिन आज यहां के नेता, जनप्रतिनिधिगण सभी ठेकेदारी में व्यस्त हैं और उन्हे ऐसे संवेदनशील मुद्दों से कोई मतलब नही है।



